“वोट चोरी” से “पार्टी चोरी” तक: राहुल गांधी के बयान के बीच कांग्रेस के इतिहास पर भी नजर

कांग्रेस के चुनाव चिन्ह का संक्षिप्त इतिहास
“वोट चोरी” से “पार्टी चोरी” तक: राहुल गांधी के बयान के बीच कांग्रेस के इतिहास पर भी नजर
नई दिल्ली, 18 सितंबर 2026।
तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद के बीच लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 18 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग और भाजपा पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि पहले शिवसेना, फिर NCP और अब तृणमूल कांग्रेस के मामले में एक जैसा पैटर्न दिखाई देता है—पार्टी में विभाजन और उसके बाद चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद। उन्होंने इसे “वोट चोरी, सरकार चोरी और अब पार्टी चोरी” से जोड़ा।
यह राहुल गांधी का राजनीतिक आरोप है। चुनाव आयोग का कहना है कि TMC के नाम और चिन्ह को लेकर दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के दावे के बीच उसका अंतरिम आदेश दोनों पक्षों को समान स्थिति में रखने के लिए है और अंतिम निर्णय बाद की प्रक्रिया में होगा।
लेकिन सवाल इतिहास का भी है
जब आज किसी राजनीतिक दल के विभाजन, नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर “पार्टी चोरी” जैसी भाषा इस्तेमाल होती है, तो भारत के राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस के पुराने विभाजनों और चुनाव चिन्हों का इतिहास भी याद आता है।
कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हमेशा “हाथ” नहीं रहा है।
1951-52 के पहले आम चुनावों के समय कांग्रेस को “दो बैलों की जोड़ी” का चुनाव चिन्ह मिला था। 1969 में कांग्रेस में बड़ा विभाजन हुआ और कांग्रेस (O) तथा कांग्रेस (R) दो अलग-अलग धड़ों के रूप में सामने आए। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद हुआ।
1971 में चुनाव आयोग ने इंदिरा गांधी समर्थित कांग्रेस को “गाय और बछड़ा” तथा दूसरे धड़े को “चरखा चलाती महिला” का चिन्ह दिया। बाद में कांग्रेस के भीतर फिर विभाजन हुआ।
1978 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले कांग्रेस धड़े को चुनाव आयोग ने “हाथ” का चुनाव चिन्ह दिया। आगे चलकर यही चिन्ह कांग्रेस की पहचान बन गया और 1984 के लोकसभा चुनाव से कांग्रेस (I) को कांग्रेस के रूप में मान्यता मिली।
क्या इसे “पार्टी चोरी” कहना सही है?
यहां इतिहास और राजनीतिक आरोप को अलग-अलग रखना जरूरी है।
दस्तावेज बताते हैं कि कांग्रेस में कई बार संगठनात्मक विभाजन हुए और अलग-अलग धड़ों को अलग चुनाव चिन्ह मिले। लेकिन इन ऐतिहासिक घटनाओं को सीधे आज के किसी “पार्टी चोरी” के आरोप के बराबर रखना एक राजनीतिक व्याख्या होगी, न कि अपने आप में स्थापित तथ्य।
इसी तरह, राहुल गांधी का TMC विवाद पर “पार्टी चोरी” वाला आरोप उनका राजनीतिक दृष्टिकोण है। चुनाव आयोग की प्रक्रिया और उसके अंतिम निर्णय को अलग से देखना होगा।
कांग्रेस के चुनाव चिन्ह का संक्षिप्त इतिहास
1951-52: दो बैलों की जोड़ी
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1969: कांग्रेस का बड़ा विभाजन
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1971: अलग-अलग कांग्रेस धड़ों को अलग चिन्ह
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1978: इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले कांग्रेस धड़े को “हाथ”
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1984 से: कांग्रेस की पहचान के रूप में “हाथ” चिन्ह
इस इतिहास से एक तथ्य स्पष्ट है—राजनीतिक दलों के विभाजन और चुनाव चिन्हों के विवाद भारतीय राजनीति में नए नहीं हैं।
आज की बहस का असली प्रश्न
आज की बहस केवल राहुल गांधी के बयान तक सीमित नहीं है। बड़ा प्रश्न यह है कि जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के भीतर दो गुट अपने-अपने दावे करते हैं, तो नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार किस आधार पर तय किया जाना चाहिए?
भारत में चुनाव चिन्हों के आवंटन और आरक्षण के लिए चुनाव आयोग के पास निर्धारित नियम और प्रक्रियाएं हैं। Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 इस व्यवस्था का प्रमुख आधार है।
इसलिए किसी भी मामले में राजनीतिक आरोपों के साथ-साथ चुनाव आयोग के आदेश, न्यायालय के निर्णय और संबंधित दस्तावेजों को भी देखना आवश्यक है।
निष्कर्ष
राहुल गांधी ने आज “वोट चोरी, सरकार चोरी और अब पार्टी चोरी” का राजनीतिक मुद्दा उठाया है। दूसरी ओर, कांग्रेस का अपना इतिहास बताता है कि पार्टी ने भी कई बड़े विभाजन और चुनाव चिन्हों में परिवर्तन देखे हैं।
इसलिए वर्तमान राजनीतिक बहस को समझने के लिए आरोपों के साथ इतिहास और आधिकारिक दस्तावेज—तीनों को सामने रखना जरूरी है।
इतिहास सवाल पूछने की अनुमति देता है; अंतिम निष्कर्ष तथ्यों और दस्तावेजों से निकलना चाहिए।
